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राजनीतिक दलों में आचार संहिता की दहशत


नजर नहीं आ रही चुनावी हलचल
सीकर/न्यूज
चुनाव आयोग की ओर से जारी निर्देशों एवं कसी गई लगाम की दहशत राजनीतिक दलों के अलावा चुनावी मैदान में उतरे निर्दलीय उम्मीदवारों को भी सता रही है। आचार संहिता के पढ़ाए गए पाठ का असर न केवल उम्मीदवारों बल्कि उनके कार्यकर्ताओं पर भी गहरा असर कर गया है। मतदाताओं को लुभाने, ध्वनि प्रसारण यंत्रों के जरिए व्यापक प्रचार प्रसार, उम्मीदवारों को जगह जगह फलों और सिक्कों से तौलने, दिन रात आम सभाओं व नुक्कड़ सभाओं के आयोजन पर लगी रोक तथा निर्वाचन आयोग की पैनी नजर का असर इस बार पूरी तरह से साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। लोकतंत्र को मजबूत बनाने एवं निष्पक्ष व भयमुक्त मतदान प्रक्रिया को अंजाम दिए जाने की कवायद अब रंग लाने लगी है। निर्वाचन आयोग की ओर से प्रत्येक मतदान केंद्रों एवं क्षेत्र पर नजर रखने के लिए नियुक्त किए गए सेक्टर प्रभारियों व बूथ लेवल अधिकारियों की ओर से बरती जा रही सख्ती के चलते प्रमुख दलों के चुनावी मैदान में उतरे उम्मीदवारों की ओर से अब फूंक फूंक कर कदम रखा जा रहा है। मतदाताओं को धन का प्रलोभन एवं शराब परोसने जैसी गतिविधियों पर जहां पुलिस प्रशासन एवं निर्वाचन आयोग के दल की ओर से जगह जगह वाहनों की जांच कर संदिग्ध गतिविधियों को रोकने के लिए कार्रवाई की जा रही है, उससे चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता भी झलक दिख रही है। चुनाव आयोग की ओर से कसी गई इस लगाम की वजह से क्षेत्र में अभी तक दोनों ही प्रमुख दलों की ओर से ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है, जिससे उल्लंघन की परिभाषा में मानकर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की जाए। ग्रामीण क्षेत्र में भले ही गुपचुप तरीके से रात बे रात उम्मीदवारों की ओर से मतदाताओं के द्वार-द्वार ढोक तो दी जा रही है, लेकिन वह भी बिना किसी भारी लवाजमे के साथ। शहरी क्षेत्र में भी अभी चुनावी रंगत परवान नहीं चढ़ पाई है और न ही दलों और कार्यकर्ताओं की ओर से कोई ऐसा माहौल नजर आ रहा है।  आचार संहिता लागू होने के बाद भी चुनावी बुखार उम्मीदवारों से कहीं ज्यादा उनके चाहने वालों व कार्यकर्ताओं पर तो दिखाई दे रहा है, लेकिन इससे कहीं ज्यादा आचार संहिता की पालना ने उन्हें बांध रखा है। असामाजिक तत्वों पर कड़ी नजर और मतदान के दौरान डराने धमकाने की कार्रवाई करने वाले ऐसे बदमाशों के खिलाफ जहां चुनाव आयोग पूरी तरह से सख्त है, वहीं पुलिस की कड़ी नजर भी इन पर बनी हुई है। जैसे जैसे चुनाव की तारीख नजर आ रही है, वैसे वैसे ही उम्मीदवारों की ओर से अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए मशक्कत की जा रही है। अनावश्यक खर्चों पर लगी पाबंदी, पैड न्यूज पर नजर होने की वजह से अब चाहकर भी उम्मीदवार ऐसा कोई कार्य करने के मूड में नहीं हैं, जिससे उन पर बेजवह कोई कार्रवाई हो, लेकिन इतना जरूर है कि इस बार चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों व गैर राजनैतिक दलों पर अपना शिकंजा कसा हुआ है।
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