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...ढूंढते रह जाओगे..!!

...ढूंढते रह जाओगे..!!

  देश के तमाम समाचार पत्रों में संपादक नाम की सत्ता की ताक़त तो लगभग दशक भर पहले ही छिन गयी थी । अब तो संपादक के नाम का स्थान भी दिन-प्रतिदिन सिकुड़ता जा रहा है । इन दिनों अधिकतर समाचार पत्रों में संपादक का नाम तलाशना किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने या वर्ग पहेली को हल करने जैसा दुष्कर हो गया है । नामी-गिरामी और सालों से प्रकाशित हो रहे समाचार पत्रों से लेकर ख़बरों की दुनिया में ताजा-तरीन उतरे अख़बारों तक का यही हाल है । अख़बारों में आर्थिक नजरिये से देखें तो संपादकों के वेतन-भत्ते और सुविधाएँ तो कई गुना तक बढ़ गयी हैं लेकिन बढते पैसे के साथ  ‘पद और कद’ दोनों का क्षरण होता जा रहा है ।एक दौर था जब अखबार केवल और केवल संपादक के नाम से बिकते थे । संपादकों की प्रतिष्ठा ऐसी थी कि अखबार पर पैसे खर्च करने वाले सेठ की बजाए संपादकों की तूती बोलती थी । माखनलाल चतुर्वेदी, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, फिरोजशाह मेहता और उनके जैसे तमाम संपादक जिस भी अखबार में रहे हैं उस अखबार को अपना नाम दे देते थे और फिर पाठक अखबार नहीं बल्कि संपादक की प्रतिष्ठा, समझ और विश्वसनीयता को खरीदता था । उसे पता होता था कि इन संपादकों के होते हुए विषय वस्तु से लेकर अखबार की शैली तक पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता । पुराने दौर के संपादकों का जिक्र छोड़ भी दें तब भी आपके–हमारे दौर के राहुल बारपुते, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, कुलदीप नैय्यर, एन राम, अरुण शौरी और शेखर गुप्ता जैसे संपादकों को न तो किसी नाम की दरकार थी और न ही पहचान की, इसके बाद भी अखबार इनके नाम से अपनी ‘ब्रांडिंग’ करते थे लेकिन अब लगता है कि समाचार पत्र प्रबंधन/मालिकों पर संपादक के साथ-साथ उसका नाम भी बोझ बनता जा रहा है और वे इसे जगह की बर्बादी मानने लगे हैं तभी तो संपादक का नाम छापने के लिए ऐसी जगह और प्वाइंट साइज(शब्दों का आकार) का चयन किया जा रहा है जिससे नाम छापने की खानापूर्ति भी हो जाए और किसी को पता भी न चले कि संपादक कौन है । यहाँ संपादक का नाम से तात्पर्य प्रधान संपादक से लेकर स्थानीय संपादक जैसे विविध पद शामिल है ।

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